बिहार के दशरथ मांझी का नाम तो सबने सुना होगा जिसने पहाड़ काट रास्ता बना दिया था| वैसे ही अब हरियाणा के रहने वाले 90 वर्षीय बुजुर्ग देश के दूसरे दसरथ मांझी बने हैं| उन्होंने एक पहाड़ को काट कर पक्षियों और जानवरों को पानी पीने के लिए तालाब बनाया हैं| जो बेजुबानों के साथ ही राहगीरों की प्यास बुझा रहा है|

50 साल लग गए तालाब को बनाने में- हरियाणा राज्य के चरखी दादरी क्षेत्र के अटेला कला के रहने वाल 90 वर्षीय कल्लूराम ने दो पहाड़ों के बीच 50 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक तालाब बनाया है| जो बेजुबान जानवरों के साथ उस पहाड़ से गुजरने वाले लोगों की प्यास बुझा रहा है| इस तालाब को बनाने में उनकी 3 पीढ़ियों ने उनके साथ काम किया| तब कहीं जाकर तालाब बन पाया| अभी भी कल्लूराम, और उनके बेटे वेद प्रकाश, और उनके पोते राजेश तालाब तक जाने के लिए अस्थाई रास्ता बना रहें है| कल्लूराम के द्वारा किया गया यह कार्य मानवता के लिए एक मिसाल है|


लोगों के सुनने पड़े ताने फिर भी नहीं मानी हार- शुरू-शुरू में जब कल्लूराम ने यह कार्य करना शुरू किया तब लोग उन्हें पागल कहते थे| उनके घर लोग उनसे परेसान हो गए थे| फिर सबने यह कह कर कुछ कहना बंद कर दिया कि उन्हें जो करना हैं वो करेंगे ही भले कोई कुछ भी कहें| उनके मन में बेजुबानो की प्यास बुझाने की चाहत और उनके लिए कुछ करने का जज्बा ही था जो इतना समय लगने के बाद भी हार नहीं मानी और और आखिरकार 50 साल बाद 2010 में उनका तालाब बन के तैयार हुआ| जब से इस तालाब के बारें में सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को पता चला है, तब से ही लोग उनके काम की तारीफ़ करते नहीं थक रहें हैं| मीडिया से बातचीत में कल्लूराम की टीस साफ-साफ नजर आ रही थी कि कई बार प्रशासन से गुहार लगाने के बाद भी किसी ने नहीं ध्यान दिया और अब रास्ता नहीं बना और न ही उन्हें कोई सम्मान मिला| उनके द्वारा किया गया काम लोगों के लिए एक मिसाल बन गया है| उनके इस जज्बे को लोग सलाम कर रहें हैं|


18 साल की उम्र में आया विचार तालाब बनाने का- कल्लूराम ने बताया कि जब वह 18 साल के थे तब वह उस पहाड़ पर बकरियां और गायों को चराने जाते थे| पहाड़ों पर पानी का कोई श्रोत न होने की वजह से कई बेजुबानो की मौत हो जाती थी| उन्होंने यह वाक्या कई बार देखा, और देखने के बाद उनसे पशु-पक्षियों की इस तरह से मौत उनसे देखी नहीं गई| तभी एक दिन उन्होंने यह फैसला किया कि बेजुबानो की प्यास बुझाने के लिए पहाड़ के ऊपर एक तालाब तैयार करेंगे| इसके बाद 18 साल की उम्र से ही वह हाथ में हथौड़ा व छेनी लिए पहाड़ों की तरफ चल दिए| और लगातार कड़ी मेहनत करने के बाद 50 सालों में पहाड़ों के बीच तालाब बनाकर कर ही दम लिया| उनके द्वारा बनाए गए तालाब से हर दिन सैकड़ो पशु-पक्षियों की प्यास बुझती है| कल्लूराम आज भी हर दिन सुबह 4 बजे उठकर 1.5 किलोमीटर की चढ़ाई-चढ़ कर पानी का मटका लेकर तालाब के पास पहुँचते हैं और तालाब के आस-पास पत्थरों को उठाकर रास्ता बनाने में जुटे जाते हैं| इस तालाब तक आप गावं से निकलकर लगभग 1.5 किलोमीटर तक चढाई का सफ़र करके पहुंच सकतें हैं| भले ही कल्लूराम आज अपने काम की वजह से लोगों के लिए मिसाल बने हुए हैं| इतना ही नहीं जब इस बात की जानकारी शासन और प्रशासन को हुई थी तब उन्होंने कल्लूराम की खूब तारीफ़ की थी| लेकिन वही शासन-प्रशासन आज तक तालाब तक पहुँचने का 1.5 किलोमीटर का रास्ता नही बनवा पाई| इस बात को लेकर उनके मन में बहुत मलाल है कि मै और मेरी तीन पीढियां इस कार्य को करने में लगे हैं लेकिन सरकार ने उनकी सुध नहीं ली|